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फर्जी PhD विवाद में बड़ा मोड़: हाईकोर्ट से अंतरिम राहत के बाद 3 असिस्टेंट प्रोफेसरों ने फिर संभाला कार्यभार, 3 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
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फर्जी PhD विवाद में बड़ा मोड़: हाईकोर्ट से अंतरिम राहत के बाद 3 असिस्टेंट प्रोफेसरों ने फिर संभाला कार्यभार, 3 अगस्त को होगी अगली सुनवाई

ब्यूरो रिपोर्ट | अपडेटेड: 02 Aug, 2026
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    चंडीगढ़ | 2 अगस्त 2026


    फर्जी पीएचडी डिग्रियों के आधार पर नियुक्ति के आरोपों में 3 जुलाई 2026 को सेवा से हटाए गए डीएवी संस्थानों के तीन असिस्टेंट प्रोफेसरों ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से मिली अंतरिम राहत के बाद दोबारा कार्यभार ग्रहण कर लिया है। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है।


    कार्यभार संभालने वालों में डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ की मंदीप जोसन, डीएवी कॉलेज फॉर विमेन, फिरोजपुर के विनोद कुमार और डीएवी कॉलेज, जलालाबाद की शालिका रानी शामिल हैं। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त 2026 को निर्धारित है।


    उठ रहे हैं कई बड़े सवाल


    हाई कोर्ट से अंतरिम राहत मिलने के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि जब पंजाब यूनिवर्सिटी ने इन नियुक्तियों की स्वीकृति वापस ले ली थी और संबंधित डीएवी कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी ने सेवा समाप्ति के आदेश जारी कर दिए थे, तो आखिर ऐसी कौन-सी कानूनी या प्रक्रियागत कमियां रहीं जिनके आधार पर अदालत से राहत मिल गई?


    यह मामला अब केवल तीन शिक्षकों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में नियुक्तियों की पारदर्शिता, विश्वविद्यालयों की जवाबदेही और नियामकीय व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।


    RTI एक्टिविस्ट ने उठाए अहम मुद्दे


    चंडीगढ़ के RTI एक्टिविस्ट डॉ. राजिंदर के. सिंगला द्वारा उजागर किए गए इस मामले में कई दस्तावेजी साक्ष्य सामने आने का दावा किया गया है। उनके अनुसार कई महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं—


    - यदि संबंधित पीएचडी डिग्रियां 13 सितंबर 2013 के बाद अवैध मानी जा चुकी थीं, तो इन नियुक्तियों को लगभग 13 वर्षों तक कैसे जारी रखा गया?

    - यदि सीएमजे यूनिवर्सिटी, शिलांग की डिग्रियों वाले अनेक छात्रों को 2013-14 में ही प्रभावित होना पड़ा, तो नियुक्त कर्मचारियों के मामलों में अलग मानदंड क्यों अपनाए गए?

    - 27 जुलाई 2013 को पंजाब यूनिवर्सिटी सिंडिकेट द्वारा सीएमजे यूनिवर्सिटी की डिग्रियों को मान्यता न देने के निर्णय के बावजूद बाद के वर्षों में कुछ नियुक्तियों को तत्कालीन कुलपति प्रो. अरुण कुमार ग्रोवर द्वारा स्वीकृति कैसे मिली?

    - अक्टूबर 2010 में शुरू हुई सीएमजे यूनिवर्सिटी द्वारा दिसंबर 2012 में पीएचडी डिग्री प्रदान किए जाने की समयावधि भी जांच और सार्वजनिक स्पष्टीकरण का विषय बनी हुई है।


    3 अगस्त की सुनवाई पर निगाहें


    अब सभी की नजरें 3 अगस्त 2026 को होने वाली हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। न्यायालय की आगे की कार्यवाही और उपलब्ध अभिलेख ही तय करेंगे कि इस बहुचर्चित फर्जी PhD प्रकरण में अंतिम कानूनी स्थिति क्या होगी।

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