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पीयू चंडीगढ़ की राजनीति से गैंगस्टर तक का सफर: लॉरेंस से नेहरा तक कई नाम; छात्र संगठनों के वर्चस्व ने कई युवाओं को अपराध की राह पर पहुंचाया
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पीयू चंडीगढ़ की राजनीति से गैंगस्टर तक का सफर: लॉरेंस से नेहरा तक कई नाम; छात्र संगठनों के वर्चस्व ने कई युवाओं को अपराध की राह पर पहुंचाया

ब्यूरो रिपोर्ट | अपडेटेड: 29 Aug, 2026
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    पीयू चंडीगढ़ की राजनीति से गैंगस्टर तक का सफर: लॉरेंस से नेहरा तक कई नाम; छात्र संगठनों के वर्चस्व ने कई युवाओं को अपराध की राह पर पहुंचाया चंडीगढ़ से नेशन न्य
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    पीयू चंडीगढ़ की राजनीति से गैंगस्टर तक का सफर: लॉरेंस से नेहरा तक कई नाम; छात्र संगठनों के वर्चस्व ने कई युवाओं को अपराध की राह पर पहुंचाया


    चंडीगढ़ से नेशन न्यूज के लिए विशेष रिपोर्ट।


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    पंजाब यूनिवर्सिटी (PU) चंडीगढ़ की छात्र राजनीति लंबे समय से राजनीतिक बहस, संगठनात्मक वर्चस्व और चुनावी प्रतिस्पर्धा का केंद्र रही है। लेकिन इसी राजनीति का एक चिंताजनक पहलू यह भी रहा है कि कुछ पूर्व छात्र नेताओं के नाम बाद में गंभीर आपराधिक मामलों और संगठित अपराध से जुड़े। इनमें लॉरेंस बिश्नोई और संपत नेहरा के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में आए हैं। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि छात्र राजनीति स्वयं अपराध की वजह है—पीयू से जुड़े हजारों छात्र लोकतांत्रिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं—लेकिन कुछ मामलों में हिंसक कैंपस राजनीति और आपराधिक नेटवर्क के बीच संबंध जरूर सामने आए हैं।


    छात्र राजनीति में लॉरेंस बिश्नोई की एंट्री


    लॉरेंस बिश्नोई ने चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति में कदम रखा। वह DAV कॉलेज-10 से जुड़ा और बाद में पंजाब यूनिवर्सिटी की Student Organisation of Panjab University (SOPU) से सक्रिय रूप से जुड़ा। उपलब्ध पुलिस और मीडिया रिकॉर्ड के अनुसार, छात्र राजनीति से जुड़े विवादों के दौरान उसके खिलाफ शुरुआती आपराधिक मामले दर्ज हुए। बाद में वह पीयू से कानून की पढ़ाई पूरी कर अपराध की दुनिया में तेजी से आगे बढ़ा।


    उस दौर में छात्र चुनाव केवल पद हासिल करने तक सीमित नहीं रहे थे। अलग-अलग गुटों के बीच शक्ति प्रदर्शन, समर्थकों की भीड़ और कई बार हिंसक झड़पों ने कैंपस का माहौल प्रभावित किया। बिश्नोई के मामले में भी छात्र राजनीति से जुड़े विवादों को उसके अपराध की ओर बढ़ने की शुरुआती कड़ियों में गिना जाता है।


    संपत नेहरा भी रहा SOPU से जुड़ा


    संपत नेहरा भी चंडीगढ़ की छात्र राजनीति में सक्रिय रहा और SOPU का कैंपस चेयरमैन रह चुका था। वह Sri Guru Gobind Singh College, सेक्टर-26 में पढ़ता था और बाद में लॉरेंस बिश्नोई के करीब आया। 2017 में द ट्रिब्यून ने भी रिपोर्ट किया था कि नेहरा छात्र राजनीति में सक्रिय रहा था और बिश्नोई के साथ उसकी करीबी थी।


    बाद के वर्षों में नेहरा का नाम हत्या, हत्या के प्रयास, रंगदारी और हथियारों से जुड़े कई मामलों में सामने आया। 2018 में हरियाणा STF ने उसे हैदराबाद से गिरफ्तार किया था; उस समय पुलिस के अनुसार वह बिश्नोई गिरोह का महत्वपूर्ण सदस्य था।


    SOPU और अपराध के बीच कड़ी क्यों चर्चा में आई?


    2010 के दशक में SOPU के कई पूर्व नेताओं और कार्यकर्ताओं के नाम बाद में आपराधिक मामलों में सामने आए। इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत रिपोर्ट में लॉरेंस बिश्नोई, संपत नेहरा, इंदरजीत सिंह पेरी, गुरलाल बराड़ और अन्य नामों का उल्लेख किया गया था, जो कभी SOPU से जुड़े रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से कुछ लोग बाद में संगठित अपराध की दुनिया में पहुंच गए।


    हालांकि SOPU के पूर्व पदाधिकारियों ने इस पूरे घटनाक्रम को संगठन की मूल विचारधारा से अलग बताया। संगठन के संस्थापक सदस्यों में से एक ने कहा था कि SOPU की स्थापना छात्र कल्याण और छात्रों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से हुई थी और बाद के घटनाक्रम के लिए पूरे संगठन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।


    छात्र राजनीति में बाहरी राजनीतिक प्रभाव


    पीयू की छात्र राजनीति समय के साथ और ज्यादा प्रतिस्पर्धी होती गई। NSUI, SOI और ABVP जैसे राजनीतिक विचारधारा से जुड़े छात्र संगठनों की सक्रियता बढ़ी। एक समय SOPU कैंपस की प्रमुख ताकतों में शामिल था, लेकिन बाद में उसका प्रभाव कम हुआ। विश्लेषणों में मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के बढ़ते हस्तक्षेप को भी कैंपस राजनीति में बदलाव का एक कारण बताया गया।


    कुछ मामलों में गैंगस्टरों के नाम का इस्तेमाल छात्र चुनावों में प्रभाव और डर पैदा करने के लिए किए जाने की बात भी सामने आई। 2017 में द ट्रिब्यून ने रिपोर्ट किया था कि कुछ छात्र संगठनों के पोस्टरों में गैंगस्टरों के समर्थन का दावा किया जा रहा था, क्योंकि ऐसे नाम विपक्षी उम्मीदवारों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में मदद कर सकते थे।


    कैंपस की लड़ाई से संगठित अपराध तक


    लॉरेंस बिश्नोई के मामले में पुलिस रिकॉर्ड और विभिन्न जांचों के अनुसार छात्र राजनीति से जुड़े विवादों के बाद उसका संपर्क ऐसे लोगों से बढ़ा जो पहले से अपराध की दुनिया में सक्रिय थे। इसके बाद छोटी-मोटी हिंसक घटनाओं से लेकर हत्या, रंगदारी और संगठित अपराध तक उसका नेटवर्क फैलता गया। बाद में जेल से भी उसके गिरोह की गतिविधियां जारी रहने की खबरें सामने आती रहीं।


    इसी नेटवर्क में संपत नेहरा सहित कई ऐसे लोग शामिल हुए जिनसे बिश्नोई की पहचान छात्र राजनीति के दौरान हुई थी। यही वजह है कि जांच एजेंसियों और पत्रकारों ने बिश्नोई गिरोह के शुरुआती दौर को समझने के लिए उसके कैंपस कनेक्शन और छात्र राजनीति को महत्वपूर्ण कड़ी माना।


    क्या छात्र राजनीति ही अपराध की वजह है?


    यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि पीयू की छात्र राजनीति युवाओं को अपराधी बनाती है। पंजाब यूनिवर्सिटी से बड़ी संख्या में छात्र नेता आगे चलकर राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में सफल हुए हैं। समस्या उन परिस्थितियों की है जहां छात्र चुनाव में हिंसा, बाहुबल, आपराधिक छवि और राजनीतिक संरक्षण को प्रभाव का साधन समझ लिया जाता है।


    विशेषज्ञों और पूर्व छात्र नेताओं के बयानों में भी यही अंतर दिखाई देता है—एक ओर लोकतांत्रिक छात्र राजनीति को विश्वविद्यालय जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, वहीं दूसरी ओर बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप और हिंसक प्रतिस्पर्धा को इसके लिए नुकसानदायक बताया गया है।


    पीयू के लिए बड़ा सबक


    लॉरेंस बिश्नोई और संपत नेहरा की कहानी को केवल दो व्यक्तियों की अपराध यात्रा के रूप में देखना अधूरा होगा। यह घटना इस बात पर भी सवाल उठाती है कि विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति की सीमा, बाहरी प्रभाव, चुनावी हिंसा और आपराधिक तत्वों की मौजूदगी को कैसे नियंत्रित किया जाए।


    छात्र राजनीति लोकतंत्र की पहली पाठशाला हो सकती है, लेकिन जब इसमें डर, हिंसा और बाहुबल जगह बनाने लगें तो वही मंच कुछ युवाओं को गलत संगत और अपराध की ओर धकेल सकता है। पीयू से जुड़े इन मामलों की सबसे बड़ी सीख यही है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा और लोकतांत्रिक नेतृत्व के बीच अपराध की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।


    नोट: ऊपर दी गई रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों और पुलिस/जांच से संबंधित प्रकाशित विवरणों पर आधारित है। किसी व्यक्ति पर लगे आरोपों को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जाना चाहिए

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